खेत में किसान, मंच पर कलाकार… नाना पाटेकर का किसानों से था दिल का रिश्ता
डेढ़ करोड़ की कार छोड़ किसान परिवारों की मदद की कमाई का 60% सामाजिक कार्यों में लगाते थे, फार्महाउस में खुद उगाते थे आलू-बैंगन
मुंबई। दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। फिल्मों में अपने दमदार अभिनय, बेबाक अंदाज और सादगी के लिए मशहूर नाना पाटेकर की जिंदगी का एक पहलू ऐसा भी था, जो उन्हें सीधे किसानों और ग्रामीण परिवारों से जोड़ता था। किसान परिवारों की परेशानियां उन्हें भीतर तक प्रभावित करती थीं। यही वजह रही कि उन्होंने किसानों की मदद को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा सामाजिक कार्यों में लगाया और जरूरतमंद किसान परिवारों के बीच जाकर उनकी मदद की।
नाना पाटेकर की खासियत थी कि वह अपनी कमाई का करीब 60 फीसदी हिस्सा सामाजिक कार्यों में इस्तेमाल करते थे। किसान परिवारों की मदद के इसी जज्बे ने आगे चलकर उन्हें सामाजिक संस्था ‘नाम फाउंडेशन’ से जोड़ा। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर इस संस्था के जरिए महाराष्ट्र के ग्रामीण और किसान परिवारों के लिए काम किया गया।
किसान के हक में हमेशा खुलकर बोलते थे
नाना पाटेकर किसानों की आर्थिक स्थिति और उनकी फसल के उचित दाम को लेकर कई बार खुलकर अपनी बात रख चुके थे। एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि किसान सरकार से बहुत कुछ नहीं मांगता, वह सिर्फ अपनी मेहनत की सही कीमत चाहता है।
उनका कहना था कि किसान खुले आसमान के नीचे मेहनत करके फसल तैयार करता है। उसे मौसम, सूखे और जानवरों से फसल बचानी पड़ती है। इसके बाद वही अनाज पूरे देश की जरूरत पूरी करता है। ऐसे में किसान को उसकी मेहनत के मुताबिक फसल का दाम मिलना जरूरी है।
डेढ़ करोड़ की कार नहीं खरीदी, किसान परिवारों को बांटे पैसे
नाना पाटेकर के किसान प्रेम से जुड़ा एक किस्सा बेहद चर्चित रहा है। लेखक रणबीर पुष्प ने एक इंटरव्यू में बताया था कि नाना करीब डेढ़ करोड़ रुपए की कार खरीदने वाले थे।
इसी दौरान उन्होंने टीवी पर किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों की हालत देखी। परिवारों की परेशानी देखकर नाना ने कार खरीदने का फैसला बदल दिया। उन्होंने उस रकम को किसान परिवारों की मदद में लगाने का निर्णय लिया।
नाना ने अपने एक कलाकार मित्र की मदद से किसान परिवारों के लिए 15-15 हजार रुपए के चेक तैयार करवाए और उन्हें बांटा। लेकिन कुछ परिवारों की मदद करने के बाद उन्हें लगा कि समस्या इससे खत्म नहीं होगी। यहीं से किसानों के लिए बड़े स्तर पर काम करने का विचार मजबूत हुआ।
नाम फाउंडेशन के जरिए किसानों तक पहुंची मदद
किसान परिवारों की मदद की इसी सोच ने आगे चलकर ‘नाम फाउंडेशन’ के काम को दिशा दी। नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे ने महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में किसान परिवारों की मदद के लिए कई पहल कीं।
नाना का जोर सिर्फ तत्काल आर्थिक मदद पर नहीं था। वह चाहते थे कि किसान परिवारों को ऐसा सहारा मिले, जिससे वे भविष्य में अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
उन्होंने सूखा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और किसान परिवारों की समस्याओं को करीब से समझा। किसान आत्महत्याओं को लेकर भी वह लगातार चिंता जताते रहे और किसानों से किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाने की अपील करते रहे।
फिल्मी दुनिया से दूर फार्महाउस में किसान बन जाते थे नाना
नाना पाटेकर का किसानों से रिश्ता सिर्फ सामाजिक काम तक सीमित नहीं था। उन्हें खुद खेती से भी गहरा लगाव था।
पुणे के पास खडकवासला इलाके के डोणजे गांव में उनके फार्महाउस का जिक्र कई रिपोर्ट्स में मिलता रहा है। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से दूर वह यहां अपना समय बिताते थे।
फार्महाउस में धान, गेहूं और चने की खेती के साथ सब्जियां भी उगाई जाती थीं। फिल्ममेकर और एंकर शेखर सुमन ने एक बातचीत में बताया था कि नाना अपने फार्म पर आलू और बैंगन उगाते थे और कई बार उन्हें भी वहां आने के लिए कहते थे।
फार्महाउस में गाय, बैल, बकरियां और मुर्गियां भी पाली जाती थीं। खेत में उगने वाली सब्जियों का इस्तेमाल उनके भोजन में भी किया जाता था।
कमाई बांटने में भी पीछे नहीं रहे
नाना के बारे में यह भी बताया गया कि खेत की उपज से होने वाली कमाई को वह अपने साथ काम करने वाले किसानों के साथ साझा करते थे। उनका रहन-सहन बेहद सादा था।
वह कई मौकों पर खुद को किसान कहने में गर्व महसूस करने की बात कर चुके थे। उनके लिए किसान सिर्फ एक मुद्दा नहीं था, बल्कि ग्रामीण जीवन और खेती उनकी अपनी जिंदगी का भी हिस्सा थे।
‘किसान को सिर्फ पैसे नहीं, सम्मान और सहारा चाहिए’
नाना पाटेकर का किसान प्रेम इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि उन्होंने इसे केवल मंच से दिए गए भाषणों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने किसानों की समस्या पर आवाज उठाई, किसान परिवारों की मदद की, सूखा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और खेती को खुद अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया।
फिल्मों में उन्होंने कई किरदार निभाए, लेकिन असल जिंदगी में किसान परिवारों के लिए खड़े होना उनके व्यक्तित्व की सबसे अलग पहचान बन गया।
नाना पाटेकर के जाने से फिल्म जगत ने एक बेहतरीन अभिनेता खोया है, लेकिन किसान परिवारों के बीच उनकी बनाई पहचान और सामाजिक कार्यों की विरासत लंबे समय तक याद की जाएगी।